बस्तर के आदिवासियों ने पत्तों से बनाए मास्क, सुकमा में मजदूर बाहर गांव लौटे तो झोपड़ी में किया क्वेरेंटाइन -

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बस्तर के आदिवासियों ने पत्तों से बनाए मास्क, सुकमा में मजदूर बाहर गांव लौटे तो झोपड़ी में किया क्वेरेंटाइन

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रायपुर. कोरोनावायरस के संक्रमण से बचने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन है। अपील के बावजूद शहरों में लोग सड़कों पर हैं। विदेश से आए लोग अपनी पहचान छिपाने मेंलगे हुए हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसे 27 लोगों की सरकार को तलाश है। इन सबके बीच गांवों से आई तस्वीरें सुकून देती हैं। मजदूर बाहर से गांव लौटे तो उनके लिए अलग झोपड़ी बनाई, राशन का इंतजाम किया। मास्क नहीं मिले तो पत्तों से बनाए। गांव की सीमाएं सील कर दी और कहा- बाहर से आने वालों का प्रवेश मना है।

जहां स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं, वहां पत्तों का मास्क

कांकेर के आमाबेड़ा का ग्राम कुरूटोला। आदिवासी बाहुल्य इस गांव से जागरूकता की मिसाल सामने आई है। संक्रमण से बचने के लिए मास्क पहनने की सलाह दी गई है, लेकिन दूर-दूर तक स्वास्थ्य सुविधाओं का पता नहीं है। ऐसे में ग्रामीणों ने देशी तरीका अपनाया और पेड़ के पत्तों से ही मास्क बना लिया है। ग्रामीण अब इसी का उपयोग कर रहे हैं ओर सरकार की ओर से जारी की गई एडवाइजरी को भी मान रहे हैं।

ग्राम बरारी में बाहर से आने वालों का सख्त मना है

धमतरी का ग्राम पंचायत बरारी कोटाभर्री की सीमाएं ग्रामीणों ने की सील।

धमतरी का ग्राम पंचायत बरारी कोटाभर्री। ग्रामीणों ने गांव की सीमा को बांस और बल्लियों से बंद कर दिया है। इसको संभालने और देखभाल की जिम्मेदारी गांव के युवाओं के पास है। ग्रामीणों का कहना है कि 21 दिन के लिए सरकार ने बंद किया है, इसलिए किसी भी बाहरी का आना सख्त मना है। वर्तमान हालात को देखते हुए कोई भी व्यक्ति ग्राम बरारी कोटाभर्री में प्रवेश न करे। सरकार का नियम पालन करे।


मजदूरों को बस स्टैंड पर रोका, स्वास्थ्य विभाग को सूचना दी

सुकमा की पाखेला पंचायत में ग्रामीणों ने खेत में बनाई झोपड़ी।

सुकमा की पाखेला पंचायत से गए करीब एक दर्जन मजदूर अपने गांव लौटे। इसकी जानकारी ग्रामीणों को लगी तो वे बस स्टैंड पहुंच गए। सभी मजदूरों को वहीं रोक लिया और फिर स्वास्थ्य विभाग को सूचना दी। मेडिकल टीम ने सभी मजदूरों के परीक्षण बाद उनके स्वस्थ होने की जानकरी दी। इसके बाद भी ग्रामीणों ने उनके लिए गांव के पास ही एक खेत में झोपड़ी बनाकर 14 दिन अलग रहने की व्यवस्था कर दी।


खास बात यह है कि पूरा इलाका आदिवासी बाहुल्य है। पंचायत ही मजदूरों के खाने-पीने का इंतजाम भी कर रही है। जिले के अलग-अलग गांवों से काफी आदिवासी मजदूरी के लिए दूसरे प्रदेशों में जाते हैं। ज्यादातर तेलंगाना व आंध्रप्रदेश में जाकर मिर्ची तोड़ने का काम करते हैं। सुकमा जिला ओडिसा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना से लगा हुआ है। इसके चलते प्रशासन ने इसकी सीमाएं पहले ही सील कर दी हैं।

आदेश से पहले खुद ग्रामीणों ने बंद किए रास्ते

गरियाबंद केझाखरपारा गांव की सड़क पर पेड़ लगाकर बंद किया ओडिशा का रास्ता।

ओडिशा की सीमाएं गरियाबंद से मिली हुई हैं। ऐसे में यहां से लगातार वाहनों की आवाजाही जारी थी। हालांकि सरकार ने सभी सीमाओं को सील करने का आदेश जारी कर दिया था, लेकिन इससे पहले कि प्रशासन की टीम पहुंचती ग्रामीण खुद सड़क पर पहुंच गए। उन्होंने वहां पेड़ गिराकर रास्ता बंद कर दिया। जो कुछ छोटे रास्ते भी खुले हुए थे। सुबह ग्रामीणों ने उनको भी बंद कर दिया।



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कांकेर के आमाबेड़ा का ग्राम कुरूटोला में ग्रामीणों ने खुद ही बना लिया पत्तों से मास्क।

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