200 साल में पहली बार सूनी रहेंगी मस्जिदें-ईदगाह, घरों में होगी चाश्त की नमाज

शनिवार को चांद की तस्दीक नहीं हो पाई। लिहाजा, तय किया गया है कि ईद 25 मई यानी सोमवार को मनाई जाएगी। इस बीच सबसे बड़ी उलझन ये है कि नमाज कैसे अदा की जाए? वो इसलिए क्योंकि लॉकडाउन के चलते शहर की सभी मस्जिदों और ईदगाहों में लोगों के आने पर पाबंदी है। इसे ध्यान में रखते हुए शहर काजी मौलाना मोहम्मद अली फारुकी ने अपील की है कि घरों में रहकर चाश्त की नमाज अदा करें। 200 साल में ऐसा पहली बार होगा जब ईद की नमाज मस्जिदों और ईदगाहों के बजाय घरों में होगी।
दरअसल, इस्लाम में नमाज ए ईद अनिवार्य है। यही वजह है कि इस बार नमाज पढ़ने को लेकर लोगों में काफी उलझन रही। शहर काजी ने लोगों से कहा है कि ईद पर चाश्त की नमाज पढ़ें। इस नमाज को पढ़ने के लिए सुबह 8.30 से 11.30 बजे तक का वक्त सबसे सही है। चाश्त की नमाज में कम से कम 2 और ज्यादा ज्यादा 12 रकात पढ़ी जा सकती है। उन्होंने ईद की नमाज और चाश्त नमाज में अंतर बताते हुए कहा कि ईद की नमाज ईदगाह में अदा की जाती है। चाश्त की नमाज घर में रहकर अदा की जा सकती है। ईद की नमाज में छह तकबीर ज्यादा होती हैं। इस नमाज में वो तकबीरें नहीं होंगी। न ही इसमें खुतबा दिया जाएगा और न ही इसमें खुतबा सुना जाएगा। आम नफल नमाज की तरह ही यह नमाज भी पढ़ी जाएगी।
शहर में 51 मस्जिदें-ईदगाह, जानिए तीन सबसे पुरानी मस्जिदों के बारे में
200 साल में ऐसा पहली बार होगा जब राजधानी के मस्जिद और ईदगाह ईद पर सूने रहेंगे। वर्तमान में शहर में करीब 51 मस्जिदें हैं। धार्मिक प्रमुख ही यहां ईद की नमाज पढ़ पाएंगे। बाकी सभी को घर में रहकर चाश्त की नमाज अदा करनी होगी। जानिए शहर की तीन सबसे पुरानी मस्जिदों के बारे में.
छोटापारा – तेहरान की तर्ज पर है मस्जिद, मीनारें खास

छोटापारा मस्जिद का निर्माण 200 साल पहले हुआ था। यहां की जो सबसे खास बात है वो है इसकी मीनारें। इस पर गोल घुमावदार सीढ़ियां बनाई गई हैं। जब लाउड स्पीकर्स नहीं थे, मौलाना इन्हीं सीढ़ियों के जरिए ऊपर जाकर अजान देते थे। जानकार बताते हैं कि यह मस्जिद ईरान के तेहरान की तर्ज पर बनाई गई है।
बैरनबाजार – साथ बनवाए गए मंदिर-मस्जिद और चर्च

बैरनबाजार में जामा मस्जिद के आगे एक चर्च है। पास ही देवी का प्राचीन मंदिर भी है। माना जाता है कि इन तीनों का निर्माण एकसाथ करीब 170 साल पहले हुआ था। दरअसल, तब पेंशनबाड़ा इलाका ब्रिटिश सैनिकों की छावनी थी। यहां सैनिकों की टुकड़ियां लंबे वक्त के लिए रूका करती थीं। इसमें अलग-अलग धर्मों को मानने वाले थे। ब्रिटिश सेना के प्रमुख लॉर्ड बैरंड ने एकसाथ 3 धार्मिक केंद्र उन्हीं सैनिकों के लिए बनवाए थे। जानकार बताते हैं कि जामा मस्जिद का नाम पहले पल्टन मस्जिद था।
मौदहापारा – 56 फीट ऊंचा है द्वार, गुंबद ताजमहल सा

90 साल पुरानी मौदहापारा की अशरफुल औलिया मस्जिद सूबे की सबसे बड़ी मस्जिद है। इसका मुख्य द्वार ही करीब 56 फीट ऊंचा है। इसके अलावा इसकी 195-195 फीट ऊंची 2 मीनारें और गुंबद ताजमहल का अहसास कराती हैं। यहां 5 हजार बंदे एकसाथ बैठकर नमाज अदा कर सकते हैं। यह पूरी तरह से वातानुकूलित है।



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Mosques-Idgah will be heard for the first time in 200 years, there will be chant prayers in homes

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