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12 हजार में केवल डेढ़ हजार बसें रोड पर, जिन रास्तों पर चलती थीं 15 बसें अब वहां केवल दो या तीन ही


कोरोना की वजह से प्रदेश में 100 से ज्यादा दिनों तक बंद रही बसें सितंबर में शुरू हुईं, लेकिन 15 दिन में पूरा सिस्टम फिर चरमरा गया है। प्रदेश में 12 हजार बसें हैं और शुरू में लगभग आधी चलाई गई थीं, लेकिन दो हफ्ते में ही सड़कों पर लगभग डेढ़ हजार बसें ही बाकी रह गई हैं। अर्थात, 7 में से सिर्फ 1 बस चल रही है, बाकी खड़ी करनी पड़ी हैं। वजह साफ है, शहर ही नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी लोगों ने यात्रा ही बंद कर दी है। किसी भी रूट पर यात्री नहीं मिल रहे हैं। बस ऑपरेटरों का कहना है कि अभी जितनी बसें चल रही हैं, उनमें भी यात्री इतने कम हैं कि एक-एक कर बंद करनी पड़ेंगी।
राज्य शासन ने बस संचालकों को टैक्स में छूट दी है। भाड़ा बढ़ाने के आश्वासन और खड़ी रहने वाली गाड़ियों में टैक्स नहीं लेने के निर्णय के बाद आपरेर्टस ने बस चलाने में सहमति दी है। 2 सितंबर के बाद से प्रदेश के लगभग सभी रूट्स में बसें शुरू कर दी गई हैं। उनकी संख्या बहुत कम है। जैसे किसी रूट में दिनभर में 10 बसें चलती थीं, वहां अब दो बसें ही चलाई जा रही हैं। सबसे ज्यादा रश वाले रुट मंदिरहसौद, महासमुंद, बागबाहरा, पिथौरा, बसना, राजिम, गरियाबंद, कांकेर, धमतरी, जगदलपुर, बेमेतरा, कवर्धा, अंबिकापुर, बलरामपुर, कोरिया, सूरजपुर, रायगढ़ आदि सभी रूटों में बस तो शुरू कर दी गई है लेकिन कुल मिलाकर राज्यभर में लगभग 1500 बसें ही चल रही हैं। राज्य में लगभग 12 हजार बसें हैं।

इंटरस्टेट बसें भी खाली
कोरोना महामारी के कारण एक तरफ राज्यभर में चलने वाली बसों की स्थिति खराब है, वहीं दूसरे राज्यों तक जाने वाली बसों को भी यात्री नहीं मिल रहे हैं। छत्तीसगढ़ से मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश, झारखंडा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल इत्यादि राज्यों के लिए बसें चलती हैं। राज्य की सीमाएं खोल दी गई हैं, लेकिन महामारी के फैलने की वजह से लोग खुद ही सफर नहीं करना चाह रहे हैं। नतीजा ये हुए है कि इंटरस्टेट बसें 2 हजार से ज्यादा हैं, लेकिन अभी सड़कों पर बमुश्किल ढाई सौ ही बची हैं।

खर्च निकालना मुश्किल
बस आपरेटर्स एसोसिएशन के सदस्य भावेश दुबे ने कहा कि इस समय सबसे ज्यादा संकट की स्थिति बस सेवा और उससे जुड़े हुए लोगों को है। दिक्कत यह है कि बसें खड़ी रहने में भी परेशानी है क्योंकि महीनों खड़ी रहने से बसें खराब हो जाती हैं। चलाने में पैसेंजर नहीं होने के कारण खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है। फिर भी शासन की तरफ से कुछ राहत मिलने पर बस संचालक खतरा उठाने को राजी हुए हैं। दुबे ने कहा कि जिस तरह से कोरोना का खतरा बढ़ रहा है स्थिति सामान्य होने में वक्त लगेगा। तब तक बस संचालकों की स्थिति क्या हो जाएगी, यह कहा नहीं जा सकता।

जहां पांव रखने की जगह नहीं रहती थी, अब सूना
राजधानी में रेलवे स्टेशन के बाद शहर के सबसे व्यस्त रहने वाला पंडरी बस स्टैंडर इस समय वीरान पड़ा है। कोरोना से पहले बस स्टैंड में पैर रखने की भी जगह नहीं होती थी। चारों तरफ बसों की आवाजाही और इनके बीच से लोगों को बचते हुए निकलना भी काफी मुश्किल रहता था। 1993-94 में बस स्टैंड शुरू होने के बाद संभवत: यह पहला अवसर है जब बस स्टैंड इतने दिनों तक लगातार वीरान रहा है। आमतौर पर हड़ताल या फिर बंद के दौरान ही यहां सन्नाटा रहता था। 20 हजार से ज्यादा लोगों रोज यहां पहुंचते हैं। इन दिनों गिरने-चुने लोग ही पहुंच रहे हैं। बस स्टैंड परिसर में बस आपरेटरों की दुकानें भी एक्का-दुक्की खुल रही हैं। आसपास कुछ कालेज और यूनिवर्सिटी है। कोरोना की वजह से सब बंद है। इस वजह से भी परिसर में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है। बसों का संचालन शुरू होने से थोड़ी हलचल बढ़ी है, लेकिन यह नहीं के बराबर है।

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पंडरी बस स्टैंड।

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