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शहर में 9 स्पाॅट पर हादसे रोकने का बीड़ा उठाया, 7 दिन में होना था सर्वे पर 8 दिन में टीम नहीं बनी


प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस ने 2 सितंबर को एक-साथ मिलकर राजधानी की सड़कों पर ऐसे 9 स्पाॅट की पहचान की, जहां पिछले तीन साल में सबसे ज्यादा हादसे और मौतें हुईं। शुरुआती पड़ताल में यह बात सामने आई कि इन सभी जगहों पर कोई न कोई तकनीकी खामी है, जिस वजह से हादसे रुक नहीं रहे हैं। इसके लिए 3 अफसरों की टीम बनाई जानी थी और उन्हें एक हफ्ते में सर्वे करके रिपोर्ट देनी थी कि इन स्पाॅट्स पर क्या सुधार हो सकते हैं। इस बात को 10 दिन बीत गए, लेकिन सर्वे रिपोर्ट तो दूर, पिछले 10 दिन में सर्वे करनेवाले अफसरों की टीम नहीं बनाई जा सकी है। राजधानी जहां पूरी सरकार बैठी है, वहां ऐसी प्रवृत्ति से कलेक्टर खुद भी हैरान हैं और अफसरों से लिखित जवाब मांगा है कि आखिर ऐसा क्यों नहीं हुआ?
प्रशासन ने शहर के अंदर और बाहर जिन 9 एक्सीडेंट प्रोन एरिया (ब्लैक स्पॉट) की पहचान की गई, वहां हर साल 30 से ज्यादा सड़क हादसे हो रहे हैं। बीते 3 साल में 100 से ज्यादा हादसों में 79 लोगों की मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा मौतें टाटीबंध चौक पर हुई हैं। सिर्फ इसी एक चौराहे पर (जुड़ी सड़कें शामिल नहीं) हादसे और मौतें टाटीबंध चौक में हुए हादसों में हुई हैं। यहां दुर्घटनाओं में 15 लोगों की मौत हुई है। इसके बाद धनेली नाला से मेटल पार्क टर्निंग में हुई दुर्घटनाओं में 12 लोगों की मृत्यु हुई है। इसमें कई तो इतने गंभीर हादसे थे कि लोगों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया और किसी को अस्पताल ले जाने का भी समय नहीं मिला।

पिछले साल ऐसे 27 स्पाॅट थे, 9 ही बचे
पुलिस, परिवहन, पीडब्ल्यूडी और नेशनल हाईवे अफसरों के मुताबिक राजधानी और आउटर में पिछले साल तक 27 ब्लैक स्पॉट थे। लेकिन लगातार सुधार के बाद अब 9 ही बाकी रह गए हैं। इस वजह से इस साल जनवरी से अब तक सड़क हादसों में मौतों की संख्या कम हुई है। ब्लैक स्पॉट के लिए टीम नहीं बनने से जिलास्तरीय सड़क सुरक्षा समिति के अध्यक्ष लोकसभा सांसद सुनील सोनी ने भी गुरुवार को नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह की लापरवाही की वजह से ही दुर्घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। उन्होंने इस मामले में कलेक्टर से जानकारी लेने बात कही।
हर माह ऐसे बढ़े हादसे
जिले में 2019 में 2,146 हादसों में 458 लोगों की मौत और 1581 घायल हुए थे। शहर के बाकी हादसों की तुलना में ब्लैक स्पॉट में होने वाली दुर्घटनाएं इतनी गंभीर होती हैं कि लोगों की मौत हो जाती है। बाकी हादसों में बचने के चांस ज्यादा रहते हैं। अफसरों का कहना है कि ब्लैक स्पॉट का मतलब है कि जिस जगह पर पिछले तीन साल में एक्सीडेंट से पांच व्यक्तियों की मौत और 5 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हों, उन्हें ब्लैक स्पॉट घोषित किया जाएगा। इसी गाइडलाइन की वजह से 2016 से 2018 के बीच 10 जगहों को ब्लैक स्पॉट की सूची से हटा दिया गया था।

डिजाइन में बड़े बदलाव की जरूरत, इसलिए संयुक्त टीम
शहर में जो ब्लैक स्पॉट बच गए हैं उनके डिजाइन में बड़े बदलाव की जरूरत है। यही वजह है कि कलेक्टर ने सर्वे टीम में पुलिस के अलावा दूसरे विभागों के अफसरों को भी शामिल करने के लिए कहा था, ताकि विभागों की आपसी समन्वय से खामियों को दूर किया जा सके। खासतौर पर टाटीबंध और उरला वाली मुख्य और बायपास सड़कों पर नए ट्रैफिक इंजीनियरिंग के तहत काम करने की जरूरत है। ब्लैक स्पॉट को खत्म करने के लिए सड़कों का चौड़ीकरण और डिवाइडरों को नए सिरे से बनाना होगा। जब तक अफसरों की सर्वे रिपोर्ट नहीं आ जाती लोक निर्माण विभाग इस काम को नहीं कर सकता है। इसलिए रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो गई है।

इन स्पाॅट पर करना है सुधार
1. टाटीबंध चौक से सरोना ओवरब्रिज
2. पिंटू ढाबा से सेरीखेड़ी ओवरब्रिज
3. जिंदल इस्पात टर्निंग से रिंग रोड 3
4. भनपुरी तिराहा से भनपुरी थाना तक
5. मेटल पार्क टर्निंग से धनेली नाला
6. ग्राम बेमता से गड़रिया नाला तक
7. सिंघानिया चौक उरला से लगी रोड
8. मंदिरहसौद स्टैंड से चौराहे तक
9. पारागांव से महानदी पुल तक

“ब्लैक स्पाॅट को प्रशासन ने गंभीरता से लिया है। 2 सितंबर की बैठक में निर्देश दिए थे कि 3 अफसरों की टीम तुरंत बनाकर 7 दिन में सर्वे करना है। 9 तारीख तक रिपोर्ट आ जानी थी, लेकिन नहीं आई है। पता चला है कि टीम तक नहीं बनाई गई है। अफसरों से पूछताछ की है, रिपोर्ट मंगवा रहे हैं।”
-डा. एस भारतीदासन, कलेक्टर, रायपुर

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Pledged to stop the accident at 9 spots in the city, to be held in 7 days The team was not formed in 8 days on the survey

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