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मृत बच्चे को गर्भ में लिए 2 दिन भटकती रहीं मां; सीएचसी, जिला अस्पताल व सिम्स में नहीं किया भर्ती, निजी हॉस्पिटल में 20 हजार दिए तो बची जान


जिला स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों का शर्मनाक चेहरा सामने आया है। पति प्रसव पीड़ित पत्नी की जिला अस्पताल में डिलीवरी कराने गया। जहां ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ ने गर्भ में ही बच्चे की मौत होने की बात कहते हुए सुविधा नहीं होना बताते हुए बिलासपुर सिम्स रेफर कर दिया। बड़ी बात यह कि सिम्स में भी मामला पता चलने पर महिला को भर्ती नहीं किया।
तो पीड़ित पति बिलासपुर से उसी एंबुलेंस से पत्नी लेकर दूसरे दिन गौरेला सीएचसी पहुंचा। जहां पर बीएमओ ने फिर उसे जिला अस्पताल जाने को कहा। चक्कर लगाकर परेशान पति और पत्नी की जान पर बनी देख निजी अस्पताल ले गया। जहां मोटी रकम देकर पत्नी के गर्भ से मृत बच्चे को निकाला गया। इससे महिला की जान बच गई। इस दौरान महिला दो दिन मृत बच्चे को गर्भ में लेकर भटकती रही। गौरेला जनपद के ग्राम पडवनिया में एक शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। बताया जा रहा है कि पुनिया बाई पत्नी श्रवण 8 महीने के गर्भ से थी। बुधवार को उसे प्रसव पीड़ा शुरू होने पर सुबह करीब 10:00 बजे पति श्रवण जिला अस्पताल लेकर पहुंचा था। जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि बच्चे की गर्भ में ही मौत हो गई है। केस क्रिटिकल होने की बात कहते हुए जिला अस्पताल प्रशासन ने गर्भवती को बिलासपुर रेफर कर दिया। उसे 108 से सिम्स भेजा गया। पति का कहना है कि सिम्स के डॉक्टरों ने लॉकडाउन और कोरोना का बहाना बनाते हुए पत्नी को भर्ती करने से मना कर दिया। इसके चलते उसी 108 से पत्नी को बिलासपुर से वापस सीएचसी गौरेला लेकर गुरुवार सुबह पहुंचा। सीएचसी में डॉक्टरों ने महिला का ऑपरेशन करने से मना कर दिया। इसके बाद पति पत्नी को गौरेला के ही एक निजी अस्पताल में लेकर पहुंचा। जहां पर डिलीवरी कराने करीब 20 हजार रुपए लिए गए। महिला को 3 यूनिट खून भी चढ़ाया गया।

जीपीएम अस्पताल में सोनोग्राफी तक नहीं कराई
पीड़ित पति के अनुसार जिला अस्पताल जब वह पत्नी को लेकर पहुंचा था तो पहले सोनोग्राफी कराने कहा गया। इस समय जिला अस्पताल में सोनोग्राफी करने वाला नहीं आया था। वहां सोनोग्राफी नहीं हो सकी। इसके बाद चेकअप में पता चला कि बच्चे की गर्भ में ही मौत हो चुकी है। इसके चलते महिला को बिलासपुर रेफर कर दिया गया। इस समय ड्यूटी पर डॉ. अंकुर और डॉ. सुभद्रा पैकरा थीं।

पति बोला – पत्नी की जान बचाने लोगों की सलाह पर ले गया निजी अस्पताल
पति ने बताया सीएचसी में जब डिलीवरी से मना कर दिया तो कुछ लोग वहां आ गए। जिन्होंने बताया एक निजी अस्पताल है। वहां पर ले चलो डिलीवरी करा दी जाएगी, इससे उसकी पत्नी की जान बच जाएगी। पति का कहना है कि इसके बाद संबंधित लाेगों ने ही उक्त निजी अस्पताल में फोन करके मामला बताया। इसके बाद वह उसे लेकर निजी अस्पताल पहुंचा था। जहां पर 20 हजार देने के बाद डिलीवरी कर महिला की जान बचाई। नहीं होने से पति अपनी पत्नी को 2 दिन मृत बच्चे को कोख में लेकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकता रहा।

बीएमओ ने सीएचसी से फिर जिला अस्पताल ले जाने कही बात: गौरेला सीएचसी में जब पति महिला को लेकर पहुंचा तब ड्यूटी पर बीएमओ अमर सेंदराम थे। उन्होंने बताया कि उनके यहां गायनाकोलॉजिस्ट व सर्जन नहीं हैं। इसके कारण भर्ती नहीं ले सकते। इसलिए जिला अस्पताल ले जाना चाहिए। तब पति ने बताया कि जिला अस्पताल से ही बिलासपुर सिम्स रेफर किया गया था। जहां से वह पत्नी को वापस लेकर सीएचसी आया है।

बच्चा पेट में ही मर चुका था, जटिल केस था इसलिए सिम्स किया रेफर
“जब महिला मेरे पास आई थी। तब उसका बच्चा पेट में ही मर चुका था। हीमोग्लोबिन भी बहुत कम था। 8 महीने की गर्भवती का केस जटिल होता है। इसलिए बच्चे की सुरक्षा को देखते हुए उसे बिलासपुर सिम्स रेफर किया गया था।”
– ड्यूटी डॉक्टर सुभद्रा पैकरा, एमबीबीएस स्त्री रोग

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जिला अस्पताल से रेफर की पर्ची। गौरेला सीएचसी के बाहर इलाज की उम्मीद में बैठी पीड़ित महिला।

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