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500 से ज्यादा महिलाओं काे शिक्षित कर आत्मनिर्भर बना चुकी हैं उमा, कविता ने संवारी 300 युवतियाें की जिंदगी


इनकी पढ़ाई महिलाएं अब हैं नर्स-अकाउंटेंट जैसे जाॅब में
देवेंद्र नगर में रहने वाली उमा घाेटे पिछले 24 सालाें से आर्थिक रूप से कमजाेर महिलाओं काे साक्षर बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। उमा ने बताया, 1996 में देवेंद्र नगर से लगे हुए इलाकाें जैसे फोकट पारा, पारस नगर, त्रिमूर्ति नगर की बस्तियों में रहने वाली महिलाओं को दोपहर में घर आकर पढ़ने के लिए प्रेरित किया। महिलाओं काे पढ़ाई का महत्व समझाया। इस समझाइश का असर हुआ। कपड़े-बर्तन साफ करने का काम करने वाली महिलाएं राेज दोपहर 2 बजते ही मेरे घर पहुंच जातीं। मैं राेज उन्हें दाे से तीन घंटे पढ़ाती। फिर मैंने उन्हें समतुल्यता परीक्षा देने प्रेरित किया। जब महिलाएं इस परीक्षा में पास हाे गई ताे उन्हें ओपन बोर्ड एग्जाम देने के लिए तैयार किया। जाे महिलाएं महज 300 से 400 रुपए में लाेगाें के घर में काम करने मजबूर थीं, ओपन बाेर्ड में सफल हाेने के बाद तीन से चार गुना सैलरी पर नाैकरी मिल गई। शशि देवांगन नाम की एक युवती जाे अपनी मां के साथ दूसरों के घराें में काम करने जाती थी आज शहर के एक बड़े हॉस्पिटल में नर्स है। वहीं, राखी वर्मा नामक युवती एक बड़े फैशन स्टाेर का कैश काउंटर संभाल रही हैं। उमा अब तक 500 से ज्यादा महिलाएं और युवतियाें काे शिक्षित कर काबिल और आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। कोरोना के इस दौर में भी उमा 17 महिलाओं को ऑनलाइन पढ़ा रहीं हैं। उनसे 99261 30039 पर संपर्क कर सकते हैं।

लोगों का विराेध सहकर भी जारी रखा महिलाओं काे पढ़ाना अब वही महिलाएं कमा रहीं हैं पहले से चार गुना ज्यादा रकम

पंडरी के पास रहने वालीं 51 साल की कविता मुंदड़ा महिलाओं और युवतियाें काे साक्षर बनाने में जुटी हैं। उन्हाेंने बताया, 15 साल पहले मेरे घर काम करने वाली युवती की स्थिति काे देखकर मैंने उसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। काम हाेने के बाद राेज दाेपहर काे मैं उसे पढ़ाने लगी। फिर ख्याल आया कि अकेले एक युवती काे पढ़ाने के बजाय कुछ और काे भी एक साथ पढ़ा सकती हूं। इसके बाद आसपास के मोहल्लाें में जाकर वहां की महिलाओं को दोपहर में अपने घर आने के लिए प्रेरित किया। महिलाएं ताे पढ़ने के लिए तैयार थीं, लेकिन उनके पतियाें ने विरोध शुरू किया। उनके घर वालाें का मानना था कि पढ़ने से भी कुछ नहीं हाेगा। ऐसी स्थिति में हार मानने के बजाय मैंने महिलाओं के घरवालाें से बात की, उन्हें शिक्षा की अहमियत समझाई। फिर ऐसी बच्चियाें काे पढ़ाना शुरू किया जाे पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुकीं थीं। स्थिति ये है कि अब कविता की पढ़ाई 300 से ज्यादा युवतियां और महिलाएं निजी कंपनियाें में अच्छे पदाें पर काम कर रही हैं। ऐसी महिलाएं जो दिन-रात दूसरों के घरों में काम करके भी महज 1 से 2 हजार कमा पाती थीं, अब शाेरूम में कस्टमर अटेंडर और बिलिंग काउंटर पर काम कर 8 से 10 हजार रुपए हर महीने कमा रही हैं।

1966 से हर साल मनाया जाता है साक्षरता दिवस : अशिक्षिताें काे शिक्षा देने के लिए प्रेरित करने के मकसद से यूनेस्को ने 17 नवंबर 1965 काे तय किया कि हर साल इंटरनेशनल लिटरेसी डे मनाया जाएगा। इस फैसले के बाद से 1966 से हर साल 8 सितंबर को साक्षरता दिवस मनाया जाता है।

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कविता मुंदड़ा अपने विद्यार्थियों के साथ।

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