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अभी 10% वैक्सीन के ही ट्रायल सफल, आने के बाद साइड इफेक्ट्स भी संभव हैं; इसे दुनियाभर में भेजने के लिए 8000 जंबो जेट्स लगेंगे


कोरोनावायरस की वैक्सीन कब आएगी? कब तक आएगी? सबसे पहले कहां आएगी? कैसे मिलेगी? कीमत क्या होगी? और दुनिया में हर एक इंसान तक ये कैसे पहुंचेगी? ये जो सवाल हैं, आज दुनिया के हर इंसान के जेहन में चल रहे हैं। एक साथ चल रहे हैं। बार-बार चल रहे हैं। आइए इनका सच जानते हैं।
दुनियाभर की 20 से ज्यादा फार्मास्युटिकल कंपनियां और सरकारें दिन-रात कोरोनावायरस वैक्सीन बनाने के काम में लगी हैं। वे वैक्सीन को लेकर रूलबुक लिख रही हैं। रोज इसे अपडेट भी कर रही हैं। यानी कितनी प्रगति हुई। लेकिन अभी तक महज 10% वैक्सीन ट्रायल सफल हुए हैं।
वहीं, एक अनुमान के मुताबिक यदि वैक्सीन बन जाती है तो दुनियाभर में इसकी सप्लाई के लिए करीब 8000 जंबो जेट्स की जरूरत होगी।

वैक्सीन आई तो क्या कामयाब होगी?

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस(एम्स) में रुमेटोलॉजी डिपॉर्टमेंट में एचओडी डॉक्टर उमा कुमार कहती हैं कि कोई भी वैक्सीन आने के बाद इफेक्टिव होगी या नहीं, ये अभी बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि सभी कंपनियां अभी जल्दबाजी में वैक्सीन बनाने में जुटी हैं। दूसरी सबसे अहम बात होगी कि वैक्सीनेशन के बाद जो इम्युनिटी डेवलप हो रही है, वो प्रोटेक्टिव है कि नहीं। यह बात धीरे-धीरे पता चलेगी।

क्या साइड इफेक्ट्स भी संभव हैं?

संभव है। लेकिन वैक्सीन के साइड इफेक्ट हो रहे हैं कि नहीं हो रहे, इसे देखने के लिए कुछ समय का इंतजार करना पड़ता है। एक स्टडी के मुताबिक कोरोना से बनने वाली एंटीबॉडीज करीब पांच महीने तक ही प्रभावी हैं। ऐसे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि वैक्सीन कितनी प्रभावी होंगी, क्योंकि दुनिया में वैक्सीन बनाने की होड़ लगी हुई है। इसलिए हमें इसके रिजल्ट को देखने के लिए लंबा इंतजार करना होगा।

वैक्सीन का काम क्या?

डॉक्टर उमा कुमार के मुताबिक वैक्सीन के बहुत सारे टाइप होते हैं। यह लोकल इम्युनिटी डेवलप करती है। ये शरीर में दोबारा किसी इंफेक्शन को बढ़ने नहीं देती है। अगर कोरोना की वैक्सीन ने 80% भी संक्रमण को कंट्रोल कर दिया तो समझ लीजिए कामयाब है, क्योंकि 20% लोग तो हर्ड इम्युनिटी से बच जाएंगे।

कैसे बनती है वैक्सीन?

इंसान के खून में व्हाइट ब्लड सेल होते हैं जो उसके रोग प्रतिरोधक तंत्र का हिस्सा होते हैं। बिना शरीर को नुकसान पहुंचाए वैक्सीन के जरिए शरीर में बेहद कम मात्रा में वायरस या बैक्टीरिया डाल दिए जाते हैं। जब शरीर का रक्षा तंत्र इस वायरस या बैक्टीरिया को पहचान लेता है तो शरीर इससे लड़ना सीख जाता है।
दशकों से वायरस से निपटने के लिए दुनियाभर में जो टीके बने उनमें असली वायरस का ही इस्तेमाल होता आया है।

कितने लोगों को वैक्सीन देनी होगी?

कोविड-19 संक्रमण को रोकने के लिए यह माना जा रहा है कि 60 से 70 फीसदी लोगों को वैक्सीन देने की जरूरत होगी।

वैक्सीन बनाने में कितने साल लग जाते हैं?

  • कोई भी वैक्सीन किसी संक्रामक बीमारी को खत्म करने के लिए बनाई जाती है। अमूमन एक वैक्सीन को बनाने में करीब 5 से 10 साल लग जाते हैं। इसके बावजूद इसकी सफलता की कोई गारंटी नहीं होती है।
  • वैक्सीन से आज तक सिर्फ एक मानव संक्रमण रोग पूरी तरह खत्म हुआ है और वो है स्मालपॉक्स। लेकिन इसमें करीब 200 साल लगे।
  • इसके अलावा पोलियो, टिटनस, खसरा, कंठमाला का रोग, टीबी के लिए भी वैक्सीन बनाई गई। ये काफी हद तक सफल भी रही हैं, लेकिन आज भी हम इन बीमारियों के साथ जी रहे हैं।
  • डॉक्टर उमा कहती हैं कि यदि एक-डेढ़ साल के अंदर वैक्सीन लॉन्च होती है तो इतने कम समय में फास्ट ट्रैक करके उसकी खामियों को नहीं पकड़ सकते हैं। इसका इम्पैक्ट बाद में दिखेगा। कई बार वैक्सीन के साइड इफैक्ट्स से न्यूरोलॉजिकल, पैरालिसिस जैसी समस्याएं भी आती हैं।

वैक्सीन आने की उम्मीद कब तक कर सकते हैं?

  • कोरोनावायरस के खिलाफ वैक्सीन का ट्रायल बड़े पैमाने पर दुनियाभर में चल रहा है। इसमें हजारों लोग शामिल हैं। दुनियाभर में अभी करीब 20 कंपनियां वैक्सीन ट्रायल में लगी हैं, जिनमें से करीब 10% ही कामयाबी के रास्ते पर हैं।
  • एक वैक्सीन के निर्माण में अमूमन 5 से 10 साल लग जाते हैं। लेकिन अच्छी बात है कि कोरोना की वैक्सीन बनाने के लिए कुछ महीने के अंदर ही बड़ी संख्या में मैन्युफैक्चरर्स और इंवेस्टर्स आगे आ गए हैं। उन्होंने अपने करोड़ों रुपए दांव पर भी लगा रखा है।
  • रूस ने स्पूतनिक-5 नाम की वैक्सीन लॉन्च भी कर दी है और अक्टूबर से इसे देशभर में लोगों को लगाना शुरू भी कर दिया जाएगा। चीन ने भी वैक्सीन बनाने का दावा किया है, वो इसे पहले अपने सैनिकों को लगाने की बात कह रहा है।
  • लेकिन दुनिया के तमाम देश और स्वास्थ्य संस्थाएं इन दोनों वैक्सीन पर सवाल उठा रही हैं, क्योंकि ये रिकॉर्ड समय में बनाई गई हैं, जो आजतक नहीं हुआ।
  • WHO की लिस्ट में जिन वैक्सीन का नाम है, उनके ट्रायल अभी तीसरे फेज में ही हैं। इनमें से कुछ कंपनियों को कहना है कि वे इस साल के अंत तक वैक्सीन बनाने का काम पूरा कर लेंगी। पर WHO का कहना है कि वैक्सीन का निर्माण अगले साल जून तक ही संभव है।

वैक्सीन सबसे पहले किसे दिया जाएगा?

  • डॉक्टर उमा बताती हैं कि वैक्सीन यदि आती है तो इसे सबसे पहले हेल्थ वर्कर्स और हाई रिस्क ग्रुप को दिया जाएगा। इसके बाद 20% आबादी को लगाई जाएगी।

दुनिया के देश वैक्सीन खरीदने के लिए क्या कर रहे हैं?

  • दुनियाभर के तमाम देश फार्मा कंपनियों से वैक्सीन लेने के लिए करार कर रहे हैं। इसके अलावा अलग-अलग देश वैक्सीन बनाने और खरीदने के लिए समूह भी बनाने में जुटे हैं।
  • ब्रिटेन ने छह कंपनियों के साथ 10 करोड़ वैक्सीन डोज के लिए करार किया है। वहीं, अमेरिकी सरकार ने अगले साल जनवरी तक 30 करोड़ वैक्सीन डोज का बंदोबस्त करने की बात कही है। सीडीसी ने फार्मा कंपनियों को 1 नवंबर तक वैक्सीन को लॉन्च करने का समय भी बता दिया है।

गरीब देशों में कैसे पहुंचेगी वैक्सीन?

  • वैक्सीन खरीदने को लेकर दुनिया के हर देश की स्थिति एक जैसी नहीं है। WHO के अस्सिटेंट डायरेक्टर जनरल डॉक्टर मारियाजेला सिमाओ का कहना है कि हमारे सामने चुनौती है कि जब ये वैक्सीन बने तो सभी देशों के लिए उपलब्ध हो, न कि सिर्फ उन्हें मिले जो ज्यादा पैसे दें। हमें वैक्सीन नेशनलिज्म को चेक करना होगा।
  • WHO एक वैक्सीन टास्क फोर्स बनाने के लिए भी काम कर रहा है। इसके लिए उसने महामारी रोकथाम ग्रुप सीईपीआई के साथ काम शुरू किया है। इसके अलावा वैक्सीन अलायंस ऑफ गवर्नमेंट एंड आर्गेनाइजेशन(गावी) के साथ भी बातचीत कर रहा है।
  • अब तक 80 अमीर देशों ने ग्लोबल वैक्सीन प्लान को ज्वॉइन किया है। इस प्लान का नाम कोवैक्स है। इसका मकसद इस साल के अंत तक 2 बिलियन डॉलर रकम जुटाना है, ताकि दुनिया भर के देशों को कोरोना की वैक्सीन मुहैया कराई जा सके। हालांकि इसमें अमेरिका नहीं है। ये समूह दुनिया के 92 गरीब देशों को भी वैक्सीन उपलब्ध कराने की बात कह रहे हैं।

वैक्सीन की कीमत क्या होगी?

  • इसकी कीमत वैक्सीन पर निर्भर करेगी कि वो किस तरह की है और कितनी डोज ऑर्डर हुई है। फार्मा कंपनी मॉडर्ना को यदि वैक्सीन बेचने की अनुमति मिलती है ते वह एक डोज को 3 से 4 हजार के बीच बेच सकती है।
  • सीरम इंस्टीट्यूट का कहना है कि वो भारत में एक डोज की कीमत करीब 250-300 रुपए रखेगी। गरीब देशों में भी कम दाम पर बेचेगी।

दुनिया भर में वैक्सीन डिस्ट्रीब्यूट कैसे होगी?
इस काम में WHO, यूनिसेफ, डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स जैसी संस्थाओं का अहम रोल होगा। उन्हें इसके लिए दुनियाभर में एक कोल्ड चेन बनानी होगी। जिसमें कूलर ट्रक, सोलर फ्रिज जैसी व्यवस्थाएं भी करनी होंगी, ताकि वैक्सीन को सही तापमान में सहेज कर रखा जा सके और आसानी से कहीं भी पहुंचाया जा सके। सामान्य तौर पर वैक्सीन को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस तापमान में रखा जाता है।
कोविड-19 वैक्सीन अपडेट क्या है?

  • दुनियाभर में कोविड-19 के लिए 180 वैक्सीन बन रहे हैं।
  • 35 वैक्सीन क्लिनिकल ट्रायल्स के स्टेज में है। यानी इनके ह्यूमन ट्रायल्स चल रहे हैं।
  • 9 वैक्सीन के फेज-3 ट्रायल्स चल रहे हैं। यानी यह सभी वैक्सीन ह्यूमन ट्रायल्स के अंतिम फेज में रहै।
  • इन 9 वैक्सीन में ऑक्सफोर्ड/एस्ट्राजेनेका (ब्रिटेन), मॉडर्ना (अमेरिका), गामालेया (रूस), जानसेन फार्मा कंपनीज (अमेरिका), सिनोवेक (चीन), वुहान इंस्टिट्यूट (चीन), बीजिंग इंस्टिट्यूट (चीन), कैनसिनो बायोलॉजिक्स (चीन) और फाइजर (अमेरिका) के वैक्सीन शामिल हैं।
  • 145 वैक्सीन प्री-क्लिनिकल ट्रायल्स स्टेज में है। यानी लैब्स में इनकी टेस्टिंग चल रही है।

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