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विदेश नीति के मामले में फेल रहे ट्रम्प, उन्होंने सहयोगी देशों के नेताओं का अपमान किया; बाइडेन जीते तो उन्हें गलतियां सुधारनी होंगी


इसी महीने की बात है। पेंटागन को बताए बिना डोनाल्ड ट्रम्प के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर ने ऐलान किया कि अगले साल की शुरुआत में अमेरिका अफगानिस्तान से अपने 2500 सैनिक वापस बुला लेगा। पहले यह संख्या 4500 तय की गई थी। कुछ घंटे बाद ट्रम्प का बयान सामने आया। कहा- क्रिसमस तक सभी सैनिकों को वापस बुलाने की योजना है। इन बातों से चेयरमैन ऑफ ज्वॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ जनरल मार्क मिली हैरान थे। उन्होंने कहा- हम अपनी योजना के हिसाब से फैसला करेंगे। साथ ही उन्होंने ये भी साफ कर दिया कि इस तरह की बातें ट्विटर के जरिए नहीं बताई जातीं।

ये कैसी एडमिनिस्ट्रेशन है…
ट्रम्प प्रशासन का यह रवैया चौंकाने वाला है। क्योंकि आर्मी अफसर कई बार कह चुके हैं कि फ्रंट लाइन पर तैनात सैनिकों को अचानक हटाना उनकी जान जोखिम में डाल सकता है। तालिबान के साथ चल रही शांति वार्ता पर भी इसका असर हो सकता है। लेकिन, सिर्फ चार घंटे बाद ही दुनिया यह जान चुकी थी कि ट्रम्प प्रशासन ऐसे ही काम करता है। ट्रम्प के समर्थक भी जानते हैं कि डिप्लोमैटिक लेवल पर कई बार वो इसी तरह से परेशान वाली बातें करते हैं। क्या वे नहीं जानते कि अफगानिस्तान में कितनी जानें गंवाने के बाद कुछ हासिल नहीं हुआ। कितना बजट खर्च हुआ।

ट्रम्प का वादा
राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प ने पहले भाषण में कहा था- आज से अमेरिका फर्स्ट की नीति अपनाई जाएगी। लेकिन, अब यह साफ हो रहा है कि अमेरिकी लीडरशिप में गिरावट आ रही है और अमेरिकी ब्रांड कमजोर हो रहा है। कई मुद्दे गिनाए जा सकते हैं, जिन पर कुछ नहीं हुआ। प्रशांत महासागर को लेकर कोई डील नहीं हो सकी। पेरिस क्लाइमेट चेंज समझौते से अमेरिका हट गया। ईरान से न्यूक्लियर डील नहीं हो सकी। डब्ल्यूएचओ और यूनेस्को से विवाद चल रहे हैं।

असल मुद्दों का क्या हुआ
मिडल ईस्ट से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, ईरान से न्यूक्लियर डील या चीन से ट्रेड वॉर। ये मसले सुलझाए जाएंगे या हम वेनेजुएला और क्यूबा के पीछे पड़े रहेंगे। मिडल ईस्ट में अमन बहाली की बात करें तो इससे इजराइल फायदे में रहेगा। अमेरिका तो सिर्फ मध्यस्थ की भूमिका में है। हॉन्गकॉन्ग में चीन मर्जी चला रहा है। ताइवान और साउथ चाइना सी में टकराव के हालात हैं। ईरान पर प्रतिबंध का तो मित्र राष्ट्र ही विरोध कर रहे हैं। राष्ट्रपति किम जोंग उन से मिलते हैं। वो इंटरकॉन्टिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल बनाने में जुटा रहा है। परेड में इन्हें दुनिया के सामने पेश करता है।

हजारों सैनिक दूसरे देशों में तैनात
ट्रम्प कई बार वादा करते हैं कि सैनिकों को देश वापस लाया जाएगा। वे इसके लिए आदेश देने की बात करते हैं। लेकिन, सच्चाई ये है कि हजारों अमेरिकी सैनिक दूसरे देशों जैसे इराक, अफगानिस्तान और सीरिया में तैनात है। कई चुनौतियां हैं। चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है। रूस आग भड़काने की कोशिश कर रहा है। मिडल ईस्ट में तनाव है। लेकिन, लगता है जैसे ट्रम्प जानकर भी अंजान बने हुए हैं। यही उनकी डिप्लोमैसी है। लेकिन, मसले से बद से बदतर होते जा रहे हैं। कार्यकाल के शुरुआती दौर में उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई पीएम पर ओबामा के साथ की गई इमीग्रेशन डील रद्द करने का दबाव बनाया। पूर्व एनएसए जॉन बोल्टन का आरोप है कि ट्रम्प ने चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से कहा था कि वो अमेरिका से ज्यादा सोयाबीन और गेंहूं खरीदें।

गलत भाषा का इस्तेमाल
सीएनएन के कार्ल बेर्नस्टेन कहते हैं- ट्रम्प ने ब्रिटेन की पीएम थेरेसा मे और जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल को मूर्ख कहा था। कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो को उन्होंने कमजोर और बेईमान करार दिया। फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों के बारे में भी गलत बातें कीं। आपको ये देखना होगा कि ये सभी अमेरिका के सहयोगी देश हैं। किम जोंग उन की वे तारीफ करते हैं, लेकिन उनसे दो मीटिंग करने के बाद हमें क्या हासिल हुआ। शी जिनपिंग की पहले तारीफ की। महामारी के बाद सुर एकदम अलग हो गए।

तानाशाहों के ज्यादा करीब
फिलिपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेरेत ने ड्रग माफिया के खात्मे के नाम पर हजारों लोगों को कत्ल करवा दिया। ट्रम्प उनकी तारीफ करते हैं। तुर्की के तानाशाह बन चुके एर्डोगन को वे अपना दोस्त बताते हैं। सऊदी अरब के प्रिंस सलमान को पत्रकार खगोशी के मामले में बचाते हैं और बाद में उनका अपमान करते हैं। पुतिन से उनकी बातचीत के बारे में अब तक ज्यादा पता नहीं लग सका। कुछ किताबें आईं। कई दावे हुए और इस चुनावी दौर में उनकी चर्चा हो रही है।

बाइडेन जीते तो क्या होगा
अगर इस चुनाव में जो बाइडेन जीते तो इसके क्या मायने होंगे। रूस चुनाव में दखल देने की कोशिश कर रहा है। चीन भी पैसे और सेना की ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है। यूरोप आज भी डिफेंस पर बहुत कम खर्च करता है। मिडल ईस्ट में कई आधार पर बंटवारा है। नॉर्थ कोरिया और ईरान न्यूक्लियर हथियार पाने की कोशिशों में लगे हैं। ट्रम्प ने भले ही कुछ लोगों का अपमान किया हो। लेकिन, बाइडेन और अमेरिका के पास अब भी मौका और ताकत है। बाइडेन पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे जीते तो पेरिस जलवायु समझौते का फिर हिस्सा बनेंगे। लेकिन, ट्रम्प जीते तो वही चलता रहेगा जो पिछले चार साल में हमने देखा है।

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Donald Trump Administration foreign policy; Here’s New York Times (NYT) Opinion On US Election 2020

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