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बूलगढ़ी के ब्राह्मण मोहल्ले में ‘निर्दोष ठाकुरों’ के लिए मातम, पीड़ित के लिए कोई अफसोस नहीं; ब्राह्मण-वाल्मिकी एक-दूसरे को देखना तक नहीं चाहते


एक कुम्हार, एक नाई, चार वाल्मिकी और करीब साठ ब्राह्मण और ठाकुर परिवार। इतना ही बड़ा है बूलगढ़ी गांव। महीनेभर पहले तक यहां के लोगों की जिंदगी बस अपने खेतों तक सिमटी थी। गांव के कुछ मर्द हाथरस और आसपास के शहरों में मजदूरी करने जाते हैं। दो-ढाई सौ रुपए रोज की। वरना अधिकतर खेतों पर काम करते हैं। महिलाएं हाथ बंटाती हैं और बेटियां घर के काम तक ही सीमित रहती हैं।

गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली सड़क पर पुलिस की गाड़ियां आ-जा रही हैं। पुलिस के बैरिकेड भी बढ़ गए हैं। रविवार को मेरे यहां पहुंचने से कुछ देर पहले ही पुलिस ने राष्ट्रीय लोक दल के कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज किया था। सड़क पर चप्पलें बिखरी पड़ी हैं। भगदड़ से उठी धूल अभी बैठी भी नहीं थी कि नारेबाजी करता हुआ पुलिस बैरिकेड की ओर बढ़ रहा युवाओं का एक समूह भीड़ में बदल जाता है।

जैसे ही मीडिया के कैमरे इस ओर घूमते हैं, नारेबाजी तेज हो जाती है। कुछ युवाओं की कमर नंगी है और मुट्ठियां भिंची हुईं। वो अभियुक्तों के समर्थन में सवर्ण समाज का शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। यहां से सात किलोमीटर दूर पूर्व विधायक राजवीर पहलवान के घर हुई सवर्णों की पंचायत का असर भी यहां दिख रहा है। गैंगरेप आरोपियों के समर्थन और भीम आर्मी के खिलाफ खुलकर नारेबाजी हो रही है।

यहां से करीब सौ मीटर दूर, पुलिस की दूसरी बैरिकेडिंग के पास कुछ पत्रकार सुस्ता रहे हैं। इधर हो रहे हंगामे हंगामे पर ज्यादा ध्यान न देते हुए ये भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर के पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं। चंद्रशेखर के पहुंचने की खबर ने माहौल गरमा दिया है। सवर्ण समूह के कुछ युवा उत्तेजित हैं। वो चंद्रशेखर को गांव में घुसने देना नहीं चाहते। इसी बीच अचानक प्रशासन की गाड़ियों का एक काफिला आता है और तेजी से गांव की ओर घुसता है। इन्हीं में से एक गाड़ी में चंद्रशेखर थे।

गांव में पुलिस का बेहद सख्त पहरा है। आरोपियों के घरों की छत पर हथियारबंद जवान खड़े हैं। दंगे वाले गियर पहने पुलिसकर्मी किसी भी स्थिति से निबटने के लिए मुस्तैद हैं। पीड़ित के परिवार से मुलाकात के बाद पुलिस तेज कदमों से चंद्रशेखर को गाड़ियों की ओर ले जा रही है। बाहर निकलते हुए चंद्रशेखर कहते हैं, ‘मेरा परिवार यहां सुरक्षित नहीं है, बहुत जल्द ही मैं अपने परिजन को अपने साथ ले जाउंगा।’ मिनटभर के भीतर पुलिस चंद्रशेखर को लेकर फुर्र हो जाती है।

पीड़ित के घर के पीछे से जाने वाली गली ब्राह्मणों के मोहल्ले में पहुंचती हैं। महिलाएं दरवाजों पर खड़ी हैं। मुंह बंद हैं और आंखों में सवाल है। एक महिला पूछती है, मैडम सब कब तक ठीक होगा। मीडिया वाले यहां से कब जाएंगे? आलू बोने का टाइम आ गया है। हमारा तो सब काम धंधा ही बंद हो गया है। ये ड्यूटी पर जाते हैं, जब तक घर लौटते नहीं, हमें टेंशन लगी रहती है कि पुलिस गांव में घुसने देगी या नहीं।

मैं इस महिला से बात कर ही रही थी कि रंग-बिरंगी साड़ी पहने एक महिला मेरा हाथ थामकर पूछती है, ‘बेटी बस तू ये बता दे रामू छूट जाएगा या नहीं। बेचारा ऊंचा सुनता है, बहुत सीधा है, बिलकुल गाय है गाय। रामू उन चार अभियुक्तों में से एक है, जिसे कथित गैंगरेप के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। वो तीन बच्चों का पिता है और डेयरी पर ड्यूटी करता है।’

अपने घर के बाहर बैठा एक युवक कहता है, ‘संदीप का तो पता नहीं, लेकिन तीन लड़के तो बिलकुल निर्दोष फंसाए गए हैं। अगर रामू को फांसी हो गई तो समझो गाय कट गई। फिर इस गांव में कभी कुछ ठीक नहीं होगा।’ ब्राह्मण मोहल्ले के लोगों को रामू के जेल जाने का गहरा दुख है। वहीं बैठा एक और युवक कहता है कि उसे छुड़ाने के लिए हम जी जान लगा देंगे। हम तो इकट्ठा होकर जेल घेरने की सोच रहे थे।’

हम बात कर ही रहे थे कि एक वाल्मिकी बालक सुअरों को हांकता हुआ निकलता है। उसे देखते ही महिलाएं मुंह सिकोड़ लेती हैं। एक महिला कहती है, ये हमारी खड़ी फसल में भी सुअर घुसा दें तो हम कुछ कह नहीं सकते। वो अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाता कि एक आदमी कहता है, ‘मेरी पांच बीघा अरहर की फसल आधी खा गए, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। हरिजन एक्ट में मुकदमा कर दिया तो कौन झेलेगा।’

यहां चंद्रशेखर आजाद (भीम आर्मी का नेता) के गांव आने को लेकर कौतूहल का माहौल है। महिलाएं जानना चाहती हैं कि ‘रावण’ कैसा दिखता है। एक महिला मेरा फोन लेकर चंद्रशेखर का वीडियो देखना चाहती है। उन्हें देखकर वो कहती हैं, ‘अरे ये तो हम जैसा ही आदमी है। सुबह से इतना हल्ला हो रहा था, रावण आ रहा है, पूरे गांव में आग लगा देगा और अब फांसी होने से कोई नहीं रोक सकता।’

मैं 14 सितंबर को बाजरे के खेत में हुई घटना पर बात करना चाहती हूं। लेकिन महिलाएं मेरा ध्यान गांव की समस्याओं की ओर खींचना चाहती हैं। वो मुझे एक गंदी नाली के पास ले जाकर कहती हैं, ‘परेशानी जे है कि नाली बिलकुल साफ नहीं करतौ, मच्छरों ने खा-खा कर डेंगू बना दिओ गांम में। निरी बीमारी फैल रही हैं, कोई कर्मचारी आवत ना बिलकुल। झूठो भी ना झांकत। सालों से इस गाम में कोई आयो नई। रात को मच्छर सोन नहीं देत। निरी मीडिया आ रही है, पर ये नाली कोई ना देख रौ।’

यूं तो पीड़ित का घर यहां से बहुत दूर नहीं है, लेकिन उसके बारे में किसी को खास जानकारी नहीं है। या फिर वो बात करना नहीं चाहते। महिलाएं कहती हैं, हम तो उस तरफ जाते ही नहीं, वो वाल्मिकी हैं, हम ब्राह्मण।

पीड़ित का परिवार गांव छोड़ना चाहता है। ये महिलाएं कहती हैं, ‘इतना पैसा मिल गया, घर मिल गया, नौकरी मिल गई, अब ये यहां रहकर क्या करेंगे। चले जाएं, लेकिन गांव का माहौल अब ठीक नहीं हो पाएगा।’ उन्हें एक लड़की की मौत पर अफसोस से ज्यादा ‘निर्दोष ठाकुरों’ के फंसने की फिक्र हैं। नार्को शब्द उनके लिए नया है लेकिन वो इसका बार-बार इस्तेमाल करती हैं। वो कहती हैं, ‘अब तो नार्को ही सच निकालेगा। अगर ये लड़की वाले इतने सच्चे हैं तो नार्को क्यों नहीं करवा रहे।’

एक युवक, जो अपने आप को संदीप का दोस्त बताता है, कहता है, ‘संदीप की गलती इतनी है कि उसने ठाकुर होकर वाल्मिकी लड़की से प्यार किया। इसे लेकर वो घर में कई बार पिटा भी। खर्च करने के लिए अपनी बहन की झुमकियां तक बेच दीं।’ जब मैंने उससे पूछा कि क्या वो लड़की भी उसे ‘प्यार’ करती थी, इस सवाल का वो कोई जवाब नहीं दे पाया।

गांव में अब इस बात की चर्चा है कि पीड़ित और संदीप एक-दूसरे को पहले से जानते थे। लेकिन क्या उन्हें पहले से इस बारे में पता था, इस पर कोई जवाब नहीं देता। एक महिला कहती हैं, ‘ये काम तो छुप-छुप कर होते हैं, किसे पता चलता है।’ संदीप का दोस्त कहता है, ‘वो अलग-अलग नंबर से उसके घर पर फोन करता था। इसे लेकर लड़की के घरवालों ने संदीप के घर जाकर शिकायत भी की थी, उसके पापा ने बहुत पिटाई भी की थी।’

गांव की महिलाएं चंद्रशेखर रावण को नहीं जानती है इसलिए मोबाइल पर उसकी तस्वीर देख रही हैं।

उधर पीड़ित के घर से मीडिया की भीड़ छंट चुकी है। पुरुष परिजन अभी भी कमरे में ही बंद है। वो अब बात करना नहीं चाहते। महिलाएं घर के काम में लगने की कोशिश कर रही हैं। पीड़ित की भाभी की गोद से नवजात बेटी चिपकी है। दूसरी बेटी चारपाई पर लेटी मुंह में दूध की बोतल लिए छत को निहार रही है। तीसरी मां के पीछे-पीछे रो रही है। पीड़िता की भाभी भी टूट कर रोने लगती हैं तो घर आई रिश्तेदार उसे गले लगकर रोते हुए कहती हैं, ‘तू हिम्मत मत हार, एक तू ही है जो सबसे लड़ रही है। तू ही हिम्मत हार गई तो इस परिवार का क्या होगा?’

पीड़ित भी अपने घर की तीसरी बेटी थी। घर के हर कोने में उसकी कमी नजर आती है लेकिन उसकी मौजूदगी के निशान नहीं मिलते। 19-20 साल की ये लड़की अपनी भाभी के लिए घर के कामकाज में सहारा थी। मां के लिए पूरी दुनिया। पिता के लिए एक जिम्मेदारी जिसे वो जल्द से जल्द शादी करके पूरा कर देना चाहते थे।

उसका अपना अस्तित्व क्या था? वो क्या सोचती थी? उसके सपने क्या थे? ये अब कभी पता नहीं चल सकेगा। उसकी असमय मौत ने बूलगढ़ी गांव में समय का पहिया घुमा दिया है। जो अब कहां रुकेगा, किसी को नहीं पता। गांव से दूर खेतों में जली उसकी चिता अब ठंडी हो गई है। लेकिन उसकी लपटों से उठे सवालों में देश सुलग रहा है।

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