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कोरोनावायरस में रूटीन बिगड़ने और घर में बच्चों के चलते हो रहा तनाव डिप्रेशन की तरफ ले जा सकता है; जानें इससे बचने के क्या उपाय हैं?


सैंडी विलारियल. कोरोनावायरस के संक्रमण के चलते स्कूल और कॉलेजों के बंद होने से बच्चे घर पर ही रहने को मजबूर हैं। दुनिया में कोरोना प्रभावित देशों में कहीं भी अभी तक स्कूल नहीं खुल सके हैं। ऐसे में बच्चों को संभालना और उनकी देखभाल पैरेंट्स के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। पैरेंट्स को बच्चों और अपनी बिगड़ी हुई रूटीन के चलते तनाव और सर दर्द जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन, हम इसे हलके में नहीं ले सकते, इस तरह की साधारण सी समस्या कभी-कभी डिप्रेशन का कारण भी बन सकती है।

जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ प्रोफेसर लीना वेन बताती हैं कि खुद के स्तर पर हमारे लिए अपनी शारीरिक समस्या और मानसिक समस्या को अलग करना मुश्किल है। यानी हम आसानी से यह नहीं समझ सकते कि हमें शारीरिक समस्या है या मानसिक। इस तरह के तनाव और सर दर्द डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं। इसलिए इससे पहले की पानी सर से ऊपर चला जाए हमें बिना देरी किए डॉक्टरों की सलाह लेनी चाहिए।

पैरेंट्स को अपनी सोच बदलने की जरूरत है

  • कैसेर फैमिली फॉउंडेशन ट्रैकिंग पोल के मुताबिक करीब 600 अमेरिकी पैरेंट्स ने यह बताया कि उन्होंने कोरोनावायरस के चलते अपनी दवाइयां लेनी या तो बंद कर दीं हैं या उसे पोस्टपोंड कर दिया है।
  • वलापरेसो यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर अमान्दा जिल्होसकी के मुताबिक लोगों में इन समस्याओं पर ध्यान देने को लेकर काफी झिझक होती है। वे यह सोचते हैं कि इतनी छोटी समस्या को लेकर डॉक्टर के पास जाना सही नहीं है। यह लापरवाही कुछ ज्यादा ही भारी पड़ सकती है। डॉ. जिल्होसकी कहती हैं कि आज जब कोरोनावायरस खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है तो हमें अपनी इस सोच को बदलने की जरूरत है। हमें किसी ऐसी समस्या को नजरअंदाज करने के बजाए डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

अपनी रूटीन पर वापस आना होगा

  • डॉ. जिल्होसकी के मुताबिक कोरोनावायरस के चलते हमारी रूटीन अचानक और पूरी तरह से बदल गई है। जिसका असर हमारी मानसिक और शारीरिक हेल्थ पर भी पड़ा है। इस वजह से हम चाह कर भी नॉर्मल महसूस नहीं कर पा रहे हैं। अब हमें अपनी नॉर्मल रूटीन में वापस आना चाहिए और खुद पर ध्यान देना चाहिए।
  • इंडियनपोलिस की राइटर एरिका एन्डर्सन दो बच्चों की मां हैं। एक की उम्र दो साल है और दूसरे की चार साल है। कोरोनावायरस के चलते उनकी दिनचर्या बदल गई, बच्चों के साथ उनका व्यवहार भी बदल गया। एरिका एन्डर्सन कहती हैं, “इस बदलाव को लेकर मैं बहुत परेशान रही हूं, डॉक्टरों ने मुझे कहा कि मैं अगर तनाव लेना कम नहीं करूंगी तो मैं डिप्रेशन में जा सकती हूं, अब मैं बिल्कुल नहीं सोच रही हूं, बस अपने पुरानी रूटीन को फॉलो करने का प्रयास कर रही हूं।”

बच्चों पर भरोसा करना सीखें

  • डॉ. जिल्होसकी के मुताबिक जिनके पास 5 साल से ऊपर के बच्चे हैं वे बच्चों के बारे में ज्यादा न सोचें, उनकी केयर करनी जरूरी है, लेकिन उनकी पढाई, स्कूल, और दिनचर्या को लेकर सोचने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। स्थिति को नॉर्मल होने का इंतजार करें, बच्चे अपने रूटीन में फिर से ढल जाएंगे।
  • डॉ. जिल्होसकी के मुताबिक, 8 साल या उससे ज्यादा उम्र के बच्चों पर भरोसा करें उन्हें छोटे-मोटे कामों में इन्वॉल्व करें जैसे- ग्रॉसरी शॉपिंग और किचन के कामों में।

स्वास्थ्य को लेकर चौकन्ना रहें

  • डॉ. जिल्होसकी के मुताबिक, इस दौर में जब कोरोनावायरस के चलते मेडिकल इमरजेंसी जैसी स्थिति है, तो पैरेंट्स को बच्चों के साथ-साथ खुद के स्वास्थ्य को लेकर चौकन्ना रहना है। डॉ. जिल्होसकी और उनके सहयोगी कहते हैं कि अपने हेल्थ केयर एक्सपर्ट्स से और खुद से भी अपनी हेल्थ का चेकअप रेगुलर करते रहें। ऐसा करने से हम तनाव को कम कर पाएंगे और डिप्रेशन जैसी किसी बड़ी समस्या से सुरक्षित रहेंगे।

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