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नौकरी छोड़ी, रेस्टोरेंट बंद हुआ और बचत खत्म हो गई, फिर आया ऐसा आइडिया, जिसके दम पर हो रही लाख रुपए महीने की कमाई


फरीदाबाद के दीपक तेवतिया टेक्सटाइल इंडस्ट्री में काम किया करते थे। नौकरी के दौरान अक्सर उनके मन में ये ख्याल आता था कि नौकरी के दम पर तो तरक्की कर पाना मुश्किल है। तरक्की के लिए दीपक ने दो, तीन कंपनियां बदलीं, लेकिन कहीं भी उन्हें वो फील नहीं मिल पाया, जो वो चाहते थे। कंपनी के काम से दीपक अक्सर दिल्ली जाया करते थे। जब भी नेहरू प्लेस जाते तो खाना ‘न्यू पंजाबी खाना’ नाम के रेस्टोरेंट में ही खाते।

दीपक वहां लगने वाली ग्राहकों की भीड़ देखकर हैरत में पड़ जाते थे।। उन्हें लगता था कि इस रेस्टोरेंट के मालिक की जिंदगी कितनी बढ़िया होगी। यहां कितने लोग खाने के लिए लाइन लगाकर खड़े रहते हैं। ये सब देखकर दीपक के मन में ख्याल आ गया था कि खाने के काम में बहुत कमाई है और एक बार इसमें हाथ जरूर आजमाना है।

इसी कारण दीपक जब वहां जाते थे, तो देखते थे कि काम कैसे हो रहा है। कौन क्या कर रहा है। 2009 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और एक दोस्त के साथ मिलकर प्रॉपर्टी का काम करने लगे। लेकिन, दीपक का मन वहां भी नहीं लगा। कहते हैं, ‘प्रॉपर्टी के काम में बिना झूठ बोले, कोई पैसे ही नहीं देता था’। मन में लगता था कि ये काम भी ठीक नहीं है। हालांकि, प्रॉपर्टी का काम करते हुए दीपक ने थोड़ी बचत कर ली थी। मन में यही चल रहा था कि कैसे भी खाने का काम शुरू करना है।

2012 में उन्होंने अपनी पूरी सेविंग लगाकर फरीदाबाद में ही एक रेस्टोरेंट शुरू कर दिया। रेस्टोरेंट का मैन्यू और पैटर्न वही रखा, जो नेहरू प्लेस वाले रेस्टोरेंट का था। एक खाना बनाने वाला लड़का ढूंढा। उसके साथ तमाम रेस्टोरेंट्स में घूमकर सर्वे किया।

उसे बताया कि किस तरह से काम करना है। कैसा खाना देना है। दिल्ली में पालिका बाजार, कनॉट प्लेस, शंकर मार्केट, नेहरू प्लेस जैसी तमाम जगहों पर उसके साथ विजिट की और फिर फरीदाबाद के सेक्टर 7 में 12 हजार रुपए महीने की एक दुकान किराये से ले ली। 15 हजार रुपए सैलरी रसोइया रखा। बाकी लड़कों की सैलरी, बिजली बिल और दूसरे खर्चे थे।

दीपक कहते हैं, तीन महीने तक हम रेस्टोरेंट चलाते रहे, खाना भी बिका, लेकिन हमें बचत नहीं हो पा रही थी। 4 हजार कमा रहे थे तो 6 हजार लगा रहे थे। इस कारण तीन महीने बाद मजबूरी में काम बंद करना पड़ा, क्योंकि सेविंग पूरी खत्म हो गई थी। ये काम तो बंद हो गया, लेकिन दीपक के मन से ये बात जा नहीं रही थी कि घाटा आखिर हुआ क्यों। जब ग्राहक आ रहे थे, हर रोज चार हजार रुपए की बिक्री थी तो खर्चा छ हजार का क्यों हो रहा था।

कई दिनों तक एनालिसिस करने पर दीपक को समझ आया कि उन्होंने कमाई के लिहाज से खर्चे ज्यादा किए। दुकान का किराया, लड़कों की सैलरी, बिजली में काफी पैसा खर्च हो रहा था, जिससे रनिंग कॉस्ट मेंटेन नहीं हो पा रही थी। रेस्टोरेंट बंद होने के बाद दीपक को करीब ढाई लाख रुपए का नुकसान हुआ।

उन्होंने फिर प्रॉपर्टी का काम शुरू कर दिया, लेकिन मन में यह सोच लिया था कि खाने का काम फिर से शुरू करना तो है। वो कहते हैं- रेस्टोरेंट बंद होने के बाद मेरे मन में ये ख्याल आने लगा था कि मैं कहीं भी सक्सेस नहीं हुआ। नौकरी में मन नहीं लगा। प्रॉपर्टी का काम नहीं कर सका। रेस्टोरेंट बंद हो गया। सेविंग खत्म हो गई। वे खुद पर ही शर्मिंदा होने लगे थे। लेकिन, उन्होंने सोचा कि इन गलतियों से सीखूंगा और फिर नई शुरुआत करूंगा।

वो फिर उन जगहों पर पर विजिट करने लगे, जहां का नाम था। उनके यहां जाकर देखते थे कि वो लोग काम कैसे करते हैं। क्या-क्या वहां मिलता है। कैसे बनता है। इसी दौरान नोटबंदी हो गई तो सबके कामकाज बंद से हो गए। तब दीपक को आइडिया आया कि क्यों न फूड वैन से काम शुरू किया जाए।

इसमें न किसी को किराया देना होगा। न बिजली का बिल आएगा। प्रॉपर्टी के काम से जो पैसा जोड़ा था उससे उन्होंने ढाई लाख रुपए कीमत की एक फूड वैन खरीदी। फिर ये तय किया कि खाना बेचने के लिए वैन का इस्तेमाल करेंगे और खाना बनाने का काम कहीं ओर करेंगे।

उन्होंने अपने रिश्तेदार से 1500 रुपए महीने के किराये पर एक छोटी सी जगह ले ली। वहां किचन बनाया और सिर्फ एक आदमी बनाने वाला रखा। बाकी काम खुद ही करते थे। खुद ही उसको सामान लाकर देते थे और खुद ही वैन से सभी को खाना सर्व करते थे। इसमें भी तमाम आयटम नहीं रखे, बल्कि सिर्फ पनीर, राजमा और चावल से शुरूआत की।

वो कहते हैं, पहले मैन्यू बड़ा था और उतना खाना बिकता नहीं था। इसलिए इस बार सोचा था कि, फालतू के आयटम नहीं बढ़ाना। धीरे-धीरे क्वांटिटी का अंदाजा भी हो गया और ग्राहक आने लगे। काम चलना शुरू हुआ तो एक छोटी सी जगह लेकर काउंटर और शुरू कर लिया।

फिर भी बिजनेस को वो रफ्तार नहीं मिल पा रही थी, जो वो चाहते थे। एक दिन दोस्त ने कहा कि तू अपने बिजनेस को प्रमोट क्यों नहीं करता। तो दीपक बोले- मेरे पास ऐसा क्या है, जो मैं इसका प्रमोशन करूं। दोस्त बोले, तो ऐसा कुछ बना क्यों नहीं रहा, जिसका प्रमोशन कर सके। बस यही बात दीपक के दिमाग को क्लिक कर गई और उन्होंने सोचना शुरू कर दिया कि, ऐसा कौन सा फूड आयटम लाऊं, जो मेरी यूएसपी बने।

दीपक नेहरू प्लेस गए। वहां देखा कि, मक्खन वाला पराठा लोग खूब खाते हैं, लेकिन यह फरीदाबाद में कहीं नहीं मिलता था। उन्होंने तय किया यह आयटम अपनी फूड वैन में शुरू करेंगे। पहले-पहले लोग खाते नहीं थे, एक फुट लंबा पराठा था। 40 रुपए का था।

लेकिन, दीपक ने इसे बनाना बंद नहीं किया। इसके लिए तंदूर पर पैसा खर्च करना पड़ा। जिससे बजट गड़बड़ाने लगा, लेकिन वो लोगों से रिक्वेस्ट करते रहे कि आप एक बार टेस्ट करिए तो। धीरे-धीरे पराठा पसंदीदा हो गया। दूसरे आयटम अच्छे बिक ही रहे थे।

उन्होंने मैन्यू में कढ़ी, चपाती भी बढ़ाईं। फिर कुछ सेविंग्स हुई, एक्सपीरियंस आया और ग्राहक जुड़े तो आगे कदम बढ़ाने का सोचा। लॉकडाउन के बाद अगस्त में साढ़े छ लाख रुपए में एक जगह खरीदी, जहां उनके ढाबे “अम्बर दा ढाबा” की शुरुआत हुई। फूड वैन और पहले वाला काउंटर भी चल रहा है।

बोले, अब महीने की लाख रुपए की बचत होती है। अब ढाबे को ऐसा बनाना चाहते हैं, जिसका किचन पूरे फरीदाबाद में सबसे बड़ा हो। कहते हैं, काम बड़ा या छोटा नहीं होता, छोटी हमारी सोच होती है। लोग भी अक्सर हमें डिमोटिवेट करते हैं, लेकिन हम लगे रहते हैं तो सक्सेस जरूर मिलती है।

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