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2018 पंचायत चुनाव से अब तक 100 नेताओं की हत्या, देश में हुई 54 राजनीतिक हत्याओं में से 12 बंगाल में हुई


पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर हिंसा की राजनीति लगातार तेज हो रही है। सत्ता के दोनों दावेदार यानी सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा अपनी जमीन मजबूत करने के लिए हिंसा का सहारा लेने से नहीं चूक रही है। हालांकि, दोनों इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। भाजपा कानून और व्यवस्था के ढहने का आरोप लगा रही है तो तृणमूल कांग्रेस उस पर सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देने का। बीते सप्ताह भाजपा पार्षद मनीष शुक्ल की हत्या के बाद से ही राज्य का सियासी माहौल लगातार गरमा रहा है।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है। इतिहास गवाह है कि जब भी सत्तारुढ़ दल को किसी विपक्षी पार्टी से कड़ी चुनौती मिलती है तो हिंसा की घटनाएं तेज हो जाती हैं। यह सिलसिला वाम मोर्चा और उससे पहले कांग्रेस की सरकार के दौर में जारी रहा है। इसी कड़ी में अब तृणमूल कांग्रेस को भाजपा की ओर से मिलने वाली कड़ी चुनौती की वजह से राज्य में जगह-जगह हिंसा की घटनाएं तेज हो रही हैं।

कोरोना और इसकी वजह से होने वाले लॉकडाउन में भी ऐसी घटनाओं पर अंकुश नहीं लग सका है। बीते तीन महीनों में भाजपा के कम से कम छह लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें उत्तर दिनाजपुर जिले में हेमताबाद के विधायक देबेंद्र नाथ राय भी शामिल हैं। भाजपा ने इसके लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार हराया था। हालांकि, पुलिस ने शव के पास सुसाइड नोट बरामद होने का दावा किया था।

पश्चिम बंगाल में हो रही हिंसा के विरोध में भाजपा की महिला कार्यकर्ताओं ने भी प्रदर्शन किया था।

भाजपा नेताओं का दावा है कि साल 2018 के पंचायत चुनाव से लेकर अब तक उसके करीब सौ कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस इनके लिए आपसी रंजिश और पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराती रही है।

राजनीतिक हिंसा का आंकड़ा

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पूरे साल के दौरान देश में होने वाली 54 राजनीतिक हत्याओं में से 12 बंगाल में हुईं। लेकिन, उसी साल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को जो एडवायजरी भेजी थी, उसमें कहा गया कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा में 96 हत्याएं हुई हैं और लगातार होने वाली हिंसा गंभीर चिंता का विषय है। उसके बाद एनसीआरबी ने सफाई दी थी कि उसे पश्चिम बंगाल समेत कुछ राज्यों से आंकड़ों पर स्पष्टीकरण नहीं मिला है। इसलिए उसके आंकड़ों को फाइनल नहीं माना जाना चाहिए।

उस रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 50 हत्याएं 2009 में हुईं। उस साल अगस्त में माकपा ने एक पर्चा जारी कर दावा किया था कि दो मार्च से 21 जुलाई के बीच तृणमूल कांग्रेस ने 62 काडर की हत्या कर दी है। दरअसल, वह दौर तृणमूल कांग्रेस के मजबूती से उभरने का था। नंदीग्राम और सिंगुर में जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के जरिए ममता बनर्जी ने देश-विदेश में सुर्खियां बटोरी थीं और राज्य में उनके कार्यकर्ता वर्चस्व की होड़ में जुटे थे।

1980 और 1990 के दशक में जब बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में तृणमूल कांग्रेस औऱ भाजपा को कोई वजूद नहीं था, अक्सर वाम मोर्चा और कांग्रेस के बीच हिंसा होती रहती थी। 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु की ओर विधानसभा में पेश आंकड़ों में कहा गया था कि 1988-89 के दौरान राजनीतिक हिंसा में 86 कार्यकर्ताओं की मौत हुई। उनमें से 34 माकपा के थे और 19 कांग्रेस के। बाकियों में वाम मोर्चा के घटक दलों के कार्यकर्ता शामिल थे।

वर्ष 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 50 हत्याएं 2009 में हुईं।

उस समय माकपा के संरक्षण में कांग्रेसियों की कथित हत्याओं के विरोध में कांग्रेस ने राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की थी। पार्टी ने ज्ञापन में दावा किया था कि वर्ष 1989 के पहले 50 दिनों के दौरान उसके 26 कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है।

एनसीआरबी के आंकड़ों से साफ है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान देशभर में ऐसी हिंसा में 16 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई थी। उनमें से 44 फीसदी यानी सात घटनाएं इसी राज्य में हुई थीं।

राज्य में भाजपा के मजबूती से उभरने के बाद से राजनीतिक हिंसा और हत्याओं का सिलसिला लगातार तेज हुआ है। वर्ष 2018 के पंचायत चुनावों में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, कम से कम 50 लोगों की हत्या हुई थी। हालांकि, भाजपा नेता सौ से ज्यादा होने का दावा करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि हिंसा और राजनीतिक हिंसा के लिए कठघरे में खड़ी तृणमूल कांग्रेस सरकार का बचाव करते हुए पार्टी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने तब कहा था, “पंचायत चुनावों के दौरान हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है। 1990 के दशक में माकपा के शासनकाल के दौरान चार सौ लोग मारे गए थे। वर्ष 2003 के चुनावों में भी 40 लोगों की हत्या हुई थी। इसके मुकाबले कुछ दर्जन घटनाएं सामान्य हैं।’

जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर इस हिंसा के शिकार तृणमूल कांग्रेस के लोग भी होते रहे हैं। बीते साल 10 फरवरी को नदिया जिले में विधायक सत्यजित विश्वास की उनके घर के सामने ही सरस्वती पूजा पंडाल में बेहद करीब से गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल राय समेत कई नेता इस मामले में अभियुक्त हैं।

भाजपा इन तमाम हत्याओं के लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराती है और तृणमूल कांग्रेस भाजपा की अंदरुनी गुटबाजी को।

तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच झगड़ा कब से शुरू हुआ, यह तो कहना मुश्किल है। लेकिन, इसने तेजी पकड़ी बीते साल हुए लोकसभा चुनावों के बाद। वर्ष 2014 में महज दो सीटें जीतने वाली भाजपा को जब राज्य की 42 में से 18 सीटें मिल गईं तो वह वाम मोर्चा और कांग्रेस को पछाड़ते हुए प्रमुख विपक्ष दल के तौर पर सामने आई। इस दौरान तृणमूल कांग्रेस के कई नेता भी भगवा खेमे में शामिल हो गए। उस झटके के बाद ही तृणमूल कांग्रेस ने साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेते हुए खासकर उन इलाकों में दोबारा पैठ जमाने का प्रयास तेज किया, जहां भाजपा को कामयाबी मिली थी। वर्चस्व की इस लड़ाई में संघर्ष लाजिमी था। नतीजतन राज्य में लगातार हिंसा की खबरें मिल रही हैं।

बंगाल में कानून और व्यवस्था में कथित गिरावट और बढ़ते आपराधिक मामलों के विरोध में बीते सप्ताह भाजपा के नवान्न (राज्य सचिवालय) अभियान के दौरान जमकर हंगामा हुआ। इस अभियान को रोकने के लिए सचिवालय जाने वाले हर रास्ते को बंद कर वहां भारी तादाद में सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया गया था। लेकिन, बावजूद इसके हजारों की तादाद में वहां पहुंचने वाले समर्थकों और कार्यकर्ताओं की पुलिस वालों से जगह-जगह हिंसक भिड़ंत हुई। इस दौरान, पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठी चार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। कई जगह सुरक्षा बलों ने वाटर कैनन का भी इस्तेमाल किया। इस दौरान दर्जनों लोग घायल हो गए।

पार्टी की निगाहें अगले साल चुनाव जीत कर सत्ता पर काबिज होने पर है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक अपनी रैलियों में यह दावे कर चुके हैं। कथित हत्याओं के ऐसे तमाम मामलों में भाजपा के नेता और कार्यकर्ता निशाने पर हैं और तृणमूल कांग्रेस कठघरे में। राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी इन घटनाओं के लिए राज्य प्रशासन और पुलिस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं।

बीते सप्ताह भाजपा के नवान्न (राज्य सचिवालय) अभियान के दौरान जम कर हंगामा हुआ। इस अभियान को रोकने के लिए सचिवालय जाने वाले हर रास्ते को बंद कर वहां भारी तादाद में सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया गया था।

यह महज संयोग नहीं है कि हाल के महीनों में भाजपा के जिन आधा दर्जन नेताओं की मौत हुई है, उनमें से ज्यादातर के शव रहस्यमय परिस्थितियों में पेड़ या खंभे से लटकते बरामद हुए हैं। बीती 28 जुलाई को पूर्व मेदिनीपुर जिले के हल्दिया में भाजपा के एक बूथ अध्यक्ष का का शव भी इसी स्थिति में बरामद हुआ था। उससे पहले भाजपा नेता और उत्तर दिनाजपुर जिले के हेमताबाद के विधायक देबेंद्र नाथ राय का शव भी घर से कुछ दूर एक खंभे से लटकता मिला था।

मेदिनीपुर इलाके में ऐसी कम से कम चार घटनाएं हो चुकी हैं। भाजपा इन तमाम हत्याओं के लिए तृणमूल कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराती है और तृणमूल कांग्रेस भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी को।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दरअसल, इस रणनीति के जरिए अगले साल होने वाले अहम चुनावों की जमीन तैयार की जा रही है। राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. दिनेश कुमार गोस्वामी कहते हैं, “वर्ष 2018 के पंचायत चुनावों से पहले राज्य में जिस तरह हिंसा व हत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ था, अब अगले साल के विधानसभा चुनावों से पहले भी “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की तर्ज पर इस सिलसिले के और तेज होने का अंदेशा है।”

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एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान देशभर में ऐसी हिंसा में 16 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई थी। उनमें से 44 फीसदी बंगाल में हुई थीं।

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